गुजरात का विश्वप्रसिद्ध “गुरूकुलम साबरमती : अभिनव स्वायत्त शैक्षणिक प्रयोग”

भारत में अनेको गुरुकुल हैं परन्तु गुजरात, अहमदाबाद के साबरमती का यह गुरुकुल “हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला” सबसे अलग है | यह गुरुकुल इस समय अपने अनूठेपन और शिक्षा की सही दिशा और उसकी शशक्तता के लिए विश्व-प्रसिद्ध हो रहा है | तभी तो विदेशो तक में बसे भारतीय जिनकी अपने बच्चो को श्रेष्ठ-शिक्षा-संस्कार देने की उत्कट अभिलाषा है, की यह गुरुकुल पहली पसंद बन चुका है, और लोगों में, अपने बालक को यहाँ पढ़ाने की होड़ मची हुयी है | देश  के प्रत्येक क्षेत्र से कम से कम एक बालक यहाँ है ही, तो कोई दुबई से, कोई सिंगापूर से, तो कोई इटली से दौड़ा चला आ रहा है|

बात शिक्षा की ही हो रही है, परन्तु हर मायने में यह अभिनव है | यह शिक्षा-क्षेत्र में उठी पिछले २०० वर्षो कि सबसे शक्तिशाली तरंग है जो भारत के सभी तटों से जाकर लगने वाली है | देश भर के अभिभावक और विद्वत्जन इस तरंग के प्रभाव में अचंभित तो हुए ही हैं, प्रसन्न और तृप्त भी हुए है | हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला गुरूकुलम, साबरमती में प्राचीन-गुरुकुल परंपरा के अनुरूप शास्त्रों की नि:शुल्क और आवासीय शिक्षा ही दी जाती है |

गुरुकुल नाम से जाने जानी वाली इस संस्कृत पाठशाला में संगीत, व्यायाम, नाट्य, शास्त्र, दर्शन, संस्कृत, ज्योतिष, व्यापार, वाणिज्य, भाषा, गणित, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, इतिहास, आन्वीक्षिकी, नीतिशास्त्र, वास्तुशास्त्र, पदार्थज्ञान, चित्रकला, अभिनय, जादू, पाककला, सिलाई, गौ-शास्त्र, जुडो-कराटे, मलखम, जिम्नास्टिक, जैसे अनेकों विषयों की विश्वस्तरीय शिक्षा दी जाती है | मात्र ९० छात्रों (प्रवेश हेतु चुने हुए, २०१६ मई तक) को अध्यापन हेतु अनेको श्रेष्ठ विद्वान देश भर से यहाँ बुलाये गए हैं| ऐसे कुल १२० से भी अधिक शिक्षक हैं | घुड़सवारी यदि सीखनी हो तो, छोटे बच्चों के लिए, इस से अच्छी जगह शायद ही देश में कहीं हो जहाँ इस प्रकार निःशुल्क प्रशिक्षण सुगमता से दिया जाता हो | यहाँ किसी सरकार से अथवा किसी अन्य संस्था से न कोई मान्यता की आवश्यकता है, ना कोई डिग्री प्रमाण-पत्र आदि ही यहाँ दिए जाते हैं | राष्ट्रीयता का बोध, संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा, सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास के साथ गरीबी, बेकारी, बीमारी, भ्रष्टाचार, दुर्व्यसन, नशा, हिंसा आदि से मुक्त भारत का निर्माण ही इसका पावन उद्देश्य है|

प्रारंभिक इतिहास : मूल रूप से बेड़ा राजस्थान और हाल साबरमती निवासी श्री उत्तमभाई जवानमलजी शाह ने २३ वर्ष पूर्व इस संकल्पना का बीज बोया| उत्तमभाई आधुनिक ऋषि है, वे देश के उन गिने चुने लोगों में से है जिन्हें देश कि समस्याओं के मूल कारण (शिक्षा) के साथ-साथ उपाय भी ज्ञात है और जो स्वयं उपाय साधने में जुटे हैं| उन्होंने स्वाध्याय द्वारा भारत कि चिति को ठीक से जाना, संत-मुनियों से मार्गदर्शन प्राप्त किया | आधुनिक शिक्षा की भयंकरता से अपनी संतान की रक्षा करने हेतु, सर्वसम्पन्न श्री उत्तमभाई ने अपने व अपने भाइयो की संतान को घर में ही रखकर अध्ययन कराना शुरू किया| थोड़ी सफलता मिली, अनुकूल प्रतिसाद मिला तो समाज के अन्य २०-२५ बालकों के साथ साबरमती में ही “सिद्धाचल वाटिका” नाम से संस्कृत पाठशाला शुरू की | कालांतर में जिससे चार गुरुकुल प्रारंभ हुए| हेमचंद्राचार्य पाठशाला के साथ अहमदाबाद में ही बहिनों हेतु एक, तथा सूरत व मुंबई में एक-एक गुरुकुल प्रारंभ हुआ| वर्तमान में इन सबमे कुल मिलाकर ५०० से अधिक विद्यार्थी हैं | तथाकथित आधुनिक शिक्षा को त्यागकर, डिग्री-विहीन शिक्षण की सफलता से प्रेरित होकर ही उन्होंने दिनांक ३१-१२-२००८ को निःशुल्क और आवासीय शिक्षा प्रदान करने हेतु विधिवत रूप से हेमचंद्राचार्य गुरूकुलम का शुभारम्भ किया| प्रथम ६ वर्ष प्रचार से दूर रहते हुए , उत्तम परिणाम की प्रतीक्षा की | आधुनिक घरों से आये बालकों में गुरुकुलीय प्राचीन शिक्षा द्वारा अपेक्षित परिवर्तन, और  भवितव्य का सौंदर्य दिखा तो पिछले १-२ वर्षो में इसका पचार कार्य शुरू किया| स्थिति यह है कि आज प्रत्येक दिन औसतन कम से कम एक से दो बालक यहाँ प्रवेश हेतु आते हैं, ऐसे लगभग ३०० बालक स्थानाभाव के कारण एक वर्ष से प्रतीक्षा-सूची-रत हैं|

कार्य-पद्धति: गुरुकुल कि दिनचर्या में प्रातः 5 बजे कक्षाएं प्रारंभ होती हैं जो रात्रि ९;३० तक चलती हैं | उत्तमभाई की योजना में ७२ कलाओं का ज्ञान ही यहाँ का पाठ्यक्रम है | आधुनिक भवन को सम्पूर्ण रूप से गौ के गोबर से लीपा गया है, जहाँ विद्यार्थी निवास व अध्ययन करते हैं| गुरुकुल की गौशाला में ५० से अधिक गिर-वंश कि गायें हैं| भोजन सूर्योदय से सूर्यास्त के मध्य ही होता है | सभी सामग्री जैविक खेती से उपजाई ही उपयोग में लायी जाती है| भोजन पकाने हेतु कंडे व लकड़ी का प्रयोग किया जाता है| किसी भी प्रकार के आधुनिक उपकरण, एलपीजी, या अन्य कोई इलेक्ट्रिक सामान यहाँ उपयोग में नही लाया जाता है | आहारशास्त्र व आरोग्यशास्त्र कि दृष्टी से बैठकर पीतल व कांस्य के बर्तनों में ही भोजन कराया जाता है | सभी व्यवस्थाएं भारतीयता यानि प्रकृति के कम से कम दोहन और सहस्तित्व पर आधारित ही हैं | स्थानाभाव के कारण इतना ही कहना उचित होगा की या गुरुकुल स्वयं देखकर आने का विषय है क्यूंकि जो स्पष्टता, आनन्द और अनुभूति गुरुकुल का प्रत्यक्ष अध्ययन करने से होगी वह किसी भी लेख से प्राप्त नहीं की जा सकती, वर्ष भर और प्रतिदिन देश-भर से अतिथिगण इस गुरुकुल को जानने हेतु यहाँ पधारते ही हैं |

    भविष्य की कार्ययोजना में वर्तमान छात्रों को स्वरोजगार, व्यवसाय कि दृष्टी से व्यावहारिक प्रशिक्षण तो है ही, गुरुकुल में और अधिक संख्या में छात्र अध्ययन करें इस दृष्टी से सभी व्यवस्थाओ का विस्तारीकरण भी चल रहा है| साथ ही देश भर में ऐसे अन्य संस्थान शुरू करने हेतु यह गुरुकुल हर संभावित सहायता को तत्पर है अतः पूरे देश में नए गुरुकुल शुरू करने हेतु कार्यकर्ता देश-भर में प्रवास करते हुए प्रचार और अन्य प्रयास कर रहे हैं | गुरुकुल का अगला प्रयास आर्याग्राम की योजना है| अर्याग्राम कुछ एकड़ स्थान पर बसाया हुआ एक छोटा सा ग्राम होगा जिसमें चारों वर्ण के लोग पूर्णतः प्रकृति के सानिध्य में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व से रहेंगे| मुख्य केंद्र गुरुकुल होगा, ग्राम के सभी संसाधन नैसर्गिक हों, कृषि मुख्य व्यवसाय हो, किसी भी वस्तु के लिए दुसरो पर निर्भरता न हो, ऐसी योजना है और इस प्रकल्प की सारी तैयारियां लगभग पूर्ण हो चुकी है | भूमि के अनेक विकल्पों में से किसी एक उपयुर्क्त का चुनाव शेष है| इसका एक उद्देश्य यह है कि जो शिक्षा गुरुकुल में दी जाती है, उसका जीवन में व्यवहार्य हो, भारत के ग्रामों के समक्ष एक आदर्श उदहारण प्रस्तुत किया जा सके|

गुरुकुल शिक्षा का आदर्श: यहाँ के छात्र भविष्य में कई कलाओं से सम्पन्न उच्च कोटि के नागरिक बनेंगे | इनमे ऐसे संगीतकार, नाट्यकार, कारीगर, लेखक, आचार्य, शिक्षक, खिलाड़ी, तैयार किये जा रहे हैं, जिनमे अपनी संस्कृति के प्रति अकूत प्रेम और श्रद्धा होगी| अंग्रेजो ने डिग्री और नौकरी का घिनौना आयाम शिक्षा में जोड़कर शिक्षा के द्वारा जीवन में मात्र अर्थ-प्रधानता और अर्थ-प्रतिष्ठता आरोपित की है उस से गुरुकुल के छात्रों की यहाँ रक्षा की जाती है| व्यासायिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है कि बालक अपना व्यवसाय-रोजगार स्वयं स्थापित करे, अथवा परंपरा से चले आ रहे घर के व्यवसाय को और दक्षता से संभाले | परन्तु जिनके घर यदि ऐसा कोई व्यवसाय है जो पर्यावरण की हानी करता हो जैसे प्लास्टिक उत्पाद आदि अथवा सामाजिक विषमता लाता हो अथवा संस्कृति के पतन की और ले जाता हो अथवा किसी भी प्रकार से इस राष्ट्र की स्वाभाविक चिति के विपरीत हो, तो फिर वे (छात्र) उसके स्थान पर नया कार्य आरम्भ करेंगे |

गुरुकुल की उपलब्द्धि यदि देखें तो संस्थागत स्तर पर पहले, यहाँ का परिणाम आता है, संस्कृत वार्तालाप करते हुए छोटे बालक, आँखों पर पट्टी बांधकर देखने और पढने कि कला अल्पायु में संस्कृत व्याकरण और अन्य ग्रन्थ कंठस्थ करने वाले अनेको हैं | गुरुकुल के ही एक बालक तुषार ने वैदिक गणित द्वारा गणना करने की देश-स्तर की प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया और अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाला है | ऐसे बालको देखकर इसकी शैक्षणिक प्रगति के प्रति संतोष उपजता है | अनेको लोग जो आधुनिक शिक्षा प्रणाली से त्रस्त हैं, अपनी संतान के भविष्य को लेकर चिंतित और भयभीत हैं ऐसे लोगो के लिए यह गुरुकुल सबसे अच्छी शरणस्थली है | विराट वट-वृक्ष बन चुका यह संस्थान अपनी छाया तले नयी पीढ़ी को पुनः आर्य संस्कृति का पाठ पढ़ा रहा है|

सामाजिक स्तर पर लोगों में भारतीय शिक्षा और संस्कृति को जीवन में प्रतिष्ठित करना, संतो और विद्वतजनो के सम्पर्क से, संस्थाओं और संगठनों के सहयोग से इस दिशा में ध्रुवीकरण का कार्य हो रहा है | राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखे तो पूरे भारत में ऐसे गुरुकुल किस प्रकार खड़े हों, इस हेतु कार्यकार्ताओ द्वारा देश भर में प्रवास हो रहा है, जो लोग यहाँ आकर ऐसा गुरुकुल अपने स्थान पर शुरू करने का संकल्प ले कर गए उनकी संख्या भी प्रतिदिन बढ़ रही है इसी क्रम में सिद्ध क्षेत्र कणेरी मठ (कोल्हापूर) में का गुरुकुल मई २०१६ में प्रारंभ हुआ, सूचना मात्र से ५०० से अधिक विद्यार्थी प्रवेश हेतु आये, जिनमे से लगभग १०० विद्यार्थियों का चयन किया गया| ऐसे ही अहमदाबाद में ही एक और जोधपुर राजस्थान में एक, इस्कोन मुंबई में नवीन गुरुकुल प्रारंभ होने जा रहा है|  यद्यपि इस सूचि में कई नाम है पर यहाँ उनका ही उल्लेख किया जा रहा है जिनकी लगभग १०० प्रतिशत तैयारी हो चुकी है | ऐसे ही नवीन गुरुकुलों हेतु आचार्यो का निर्माण का दायित्व भी यह गुरुकुल भारतीय शिक्षण मण्डल के साथ निभा रहा है | दिनांक २६ से ३० जून के मध्य देश भर से आये हुए युवाओ का गुरुकुल आचार्य दृष्टी से स्वाध्याय शिबिर सम्पन्न हुआ| दिनांक ३१ से २ जून वैदिक गणित के आचार्यो का प्रशिक्षण हुआ|

समाज से गुरुकुल की अपेक्षा यही है की लोग बिना किसी भय के, पूरे आत्मविश्वास के साथ अंग्रेजी शिक्षा तंत्र पर से निर्भरता छोड़े, स्वदेशी शिक्षा का मार्ग अपनाएं | प्रत्येक जिले, ग्राम में गुरुकुल स्थापना हेतु आगे आयें, स्वाबलंबन, संस्कृत, शास्त्र, संगीत, स्वरोजगार की शिक्षा हर बालक को निःशुल्क सुलभ हो | कुल मिलाकर शिक्षा का सारा दायित्व समाज अपने कंधो पर ले |

हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला “गुरूकुलम” के विद्यार्थी तुषार विमलचंद तलावट ने अलोहा इंटरनेश्नल (Aloha International) द्वारा, इंडोनेशिया के सांस्कृतिक नगर योग्यकार्ता में २४ जुलाई २०१६ को आयोजित की गयी  अंतर्राष्ट्रीय गणित प्रतियोगिता (अंकगणित गणना) २०१६” जीत कर पूरी दुनिया में भारतीय गुरुकुलीय शिक्षण पद्धति का परचम लहराया है | पढ़ें पूरी खबर  वैदिक गणित के माध्यम से संस्कृत पाठशाला के बालक ने जीती गणित की अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता |

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  1. प्रकाश चन्द सेठिया says:

    वंदेमातरम

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