मौत की हास्यास्पद प्रस्तुति : मानवीय सभ्यता के विनाश का आर्थिक आंकलन, पश्चिमी बाजारू बुद्धि ही लगा सकती है |

दिनाँक 20 जुलाई को राजस्थान पत्रिका ने अपने लगभग सभी संस्करण मे  ग्लोबल वार्मिंग से होने वाले भावी विनाश को दर्शाती  संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की शोध रिपोर्ट से कुछ आंकड़े प्रस्तुत किए, जैसा की चित्र मे भी दर्शाया गया है | भारत के साथ-साथ अनेक देशों मे भी यह रिपोर्ट और इस से जुड़े विनाश के आंकड़े प्रकाशित हुये थे | जैसे की 1 करोड़ मनुष्यों की जान को खतरा और कोलकाता,  मुम्बई जैसे महानगरो के डूबने के भी आशंका जताई गयी है | परंतु इस शोध रिपोर्ट को सबसे पहले प्रकाशित करने वाली पश्चिम की मीडिया ने जो शीर्षक दिया वह मनुष्यता को पीढ़ा देने वाला है  और संभवतः यह शोध भी मूल रूप से इसी अनुमान को लेकर किया गया होगा कि ग्लोबल वार्मिंग से हमे कितना आर्थिक नुकसान होगा ?  गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली से जुड़ी अहमदाबाद की एक संस्कृत पाठशाला के एक विचारक जीतूभाई बालड जो खुद एक व्यापारी हैं, लोकसभा टीवी को दिये अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं कि “अगर दुनिया इसी तरह विकास की विचारधारा पर चलती रही तो हमे ऐसी बीस पृथ्वियाँ भी कम पड़ेंगी ” | अब सोचिए जरा बीस पृथ्वियाँ कम पढ़ेंगी यानि क्या ? ग्लोबल वार्मिंग को लेकर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने जो शोध प्रस्तुत किया उसे “ग्लोबल वार्मिंग से चौपट होती अर्थव्यवस्थाएँ ”  इस शीर्षक से प्रस्तुत किया गया | क्या मानवता आज बाजारवाद और उपभोक्तावादिता के दलदल मे इतना गिर चुकी है की अपने मृत्यु  के समय को भी अपना आर्थिक नुकसान समझने लगी है? हर चीज बिकाऊ हो गयी है तो क्या बुद्धि भी बिकाऊ हो गयी है ?  सवाल यह है की पृथ्वी पर जीवन को यदि खतरा है तो सम्पन्न राष्ट्रों और ‘संयुक्त-राष्ट्र’  जैसे संगठनो का क्या दायित्व बनता है ? पिछले कितने वर्षों से दुनिया भर के तमाम शक्तिशाली राष्ट्र    Earth Summit जैसे तमाम कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं ?  और इनका कोई निष्कर्ष तक नहीं निकला है | दुनिया को सबसे ज्यादा प्रदूषण देने वाले देश ऐसे अवसरों पर सबसे समझदार राष्ट्रों के अभिनय मे होते हैं |और अपनी धूर्तता से ऐसे आंकड़े और शोध प्रस्तुत करते हैं जिनसे गरीब और विकासशील देश जिम्मेदार ठहराए जा सके ! ऐसे ही एक बार एक स्कूल की शिक्षिका अपने बच्चों को बता रही थी की भारत मे चूल्हे पर रोटी बनाने से वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हुयी है | चौंकने की जरूरत नहीं है ऐसा ज्ञान जिन किताबों से उपजता है उनके निर्माण की कहानी आपको मालूम होनी  चाहिए | खैर हम चर्चा कर रहे थे दुनिया के चिंतन की दिशा की, पूरी दुनिया अमेरिका के बैटरी से फैलने वाले प्रकाश को उसके चरित्र और ज्ञान का प्रकाश समझकर उसकी पिछलग्गू बनी हूई है, आंखे मूंदकर बस सब तरक्की मतलब अमेरिका बनो पढ़ रहे हैं | और दूसरी तरफ अमेरिका जैसे देश पृथ्वी को तबाह कर के मंगल व बृहस्पति की तरफ भागने की सोच रहे हैं | स्वामी विवेकानंद ने कहा था की हर राष्ट्र का एक मूल प्राण या स्वर होता है, हर राष्ट्र का एक निश्चित व्रत होता है, एक लक्ष्य होता है जिसे उसे पूरा करना है या दुनिया को देना है | अमेरिका की नस उन्होने 1893 मे पकड़ ली थी उन्होने तब कहा था  की अमेरिका अगर विश्व मे सबसे शक्ति शाली राष्ट्र बना तो पूरी दुनिया को बाजार बना देगा, क्योंकी अमेरिका का मूल स्वभाव व्यापार है |  और देखिये आज भारत जैसे ऋषि-महर्षियों के देश मे इसी बजारवाद  ने सनी लियोनी जैसा नाम भी प्रतिष्ठित किया जा रहा है | जनता सो रही है और उनके बच्चों के लिए एक नया आदर्श का किरदार बाजार द्वारा गढा जा रहा है | दुनिया की जनता सो रही है और कुछ पश्चिमी  शक्तियाँ पूरी दुनिया को नचा रही हैं  | बाजरवाद, उपभोक्तावाद ने आज दुनिया को इतना भ्रमित कर दिया की अर्थ यानि पैसे की प्रतिष्ठा हर चीज से ऊपर हो गयी है | मानवता, मनुष्यता आदि शब्द के भी आज आर्थिक अर्थ खोजने पड़ेंगे शायद ….

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