बिलकुल सही थे द्रौणाचार्य, किसी भी वामपंथी को ताल ठोक कर दें जवाब ! भारतीय गुरु परंपरा, और राजधर्म पालक की अद्भुत मिसाल आचार्य द्रौंण !

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पर  आपको  कभी उस  तरह  नहीं समझाया  जाता  जिस  तरह ये असल में  हुआ  | बल्कि  अंग्रेज  जब  भारत के  ग्रंथों  में  भारत  को  नीचा, गलत, मूर्ख  साबित  करने  के लिए  बिन्दु खोज रहे  थे, तब  के  पश्चिमी और अब  के  वामपन्थी दृष्टिकोण  से  ही  आपकी मुलाक़ात कराई जाती  है  |

इस घटना  का  विश्लेषण  करने  से  पहले  मैं उन  लोगों  से,  जो  द्रौंण को  गलत  मानते हैं निवेदन  करता हूँ  कि आप  लोग  सर्वप्रथम तो  यह  स्पष्ट  कीजिये कि आप  महाभारत को सत्य स्वीकार  कर  रहे हैं, इसलिए फिर  रामायण और फिर राम-मन्दिर को  भी सत्य स्वीकार  कर  रहे  हैं | द्रौण की  पंचायत  हम बाद  में  निपटा  लेंगे पहले  आप  राम-मंदिर  पर  खुलकर समर्थन कीजिये ताकि  भारत  में  झगडे  की एक  वजह ख़त्म  हो,  जहां अधिकाँश मुस्लिम मंदिर बनाने के  पक्ष  में  हैं वहां सिर्फ आप जैसे  हिन्दुओ ने ही टांग  अड़ा रखी  है  .. .. .. खैर जाने  दीजिये , हमें पता  है आप  सिर्फ  विरोध  कर  सकते  हैं, गलती  ढूंढ  सकते  हैं और  कुछ नहीं ! चलिए हम अपना analysis शुरू  करते हैं |

  • महाभारत कहानी 5000 साल से  भी अधिक  पुरानी  है  इसलिए आज के  चश्मे से  आज की परिस्थितियों के हिसाब से नहीं देखा जा सकता |

  • महाभारत एक विशाल ग्रन्थ है, संभव है आपने आज तक उसकी शक्ल भी न  देखी हो ! इसमें विशाल ज्ञान-भण्डार भरा पड़ा है, अनेकों रोचक, प्रेरक, नीतिपूर्ण, अद्भुत, शोधनीय प्रसंग भरे पड़े हैं | इसकी उपयोगिता इतनी अधिक है कि बस पूछिए मत और न ये उपयोगिता पर लिखने का स्थान-समय है |

  • फिर भी पूरी महाभारत या रामायण में से कुछ ख़ास घटनाएं  (एक-दो ही) कुछ ख़ास लोगों ने समाज में बहस करने के लिए फैला रखी है जिनका अपने सन्दर्भ से बाहर आना भ्रम फैलाता है |

  • तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था आज के जैसे नहीं थी कि सबको एक ही जानकरी  ठूसी जाती है | पहले व्यक्ति की रूचि, योग्यता, क्षमता, व जीवन लक्ष्य के अनुरूप ही विद्या दी जाती थी | आज की शिक्षा को समझने के लिए यह कार्टून देखिये …

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  • द्रौण न सिर्फ अर्जुन के गुरु थे, अपितु राज्य-प्रशासन में भी एक महत्वपूर्ण स्तम्भ थे | एक तरफ जहाँ उन्हें बच्चों (जो आगे जाकर सीधा प्रशासन से जुडा कार्य देखेंगे) की ट्रेनिंग देखनी होती थी, तो दूसरी तरफ  समाज की विचारधारा, सोच आदि का ध्यान भी रखना पढता था, क्योंकि राजा से कोई गलती होगी तो दोष इसको ट्रेनिंग देने वाले गुरु पर ही आएगा | इसलिए द्रौणाचार्य की जिम्मेदारी में ही पूरा राज्य था ऐसा समझा/माना जा सकता है |

  • आगे चलकर प्रशासन कौन संभालेगा इसके लिए बचपन से ही राजकुमारों की ट्रेनिंग शुरू हो जाती थी, इसमें शस्त्र से ज्यादा शास्त्रों का महत्व होता था, जिसको सीखने और व्यवहार में/जीवन में उतारने में समय लगता था, या कठिन परिश्रम-तप-साधना करनी होती थी, इसलिए अर्जुन के अधिक वीर होने पर भी युधिष्ठिर राजा बनने के लिए अधिक योग्य था, अर्जुन जैसे लोगो को तो उसके शासन में सिर्फ सहायता/रक्षा करती थी |

  • महाभारत के अनुसार एकलव्य सैनिक बनने का अधिकारी था, और राज्य में इसके लिए अन्य पाठशालाओं, ट्रेनिंग सेंटर की व्यवस्था भी थी | परन्तु एकलव्य ने सीधे द्रौंणाचार्य से सीखना चाहा | द्रौणाचार्य ने मना कर दिया सिखाने से |

  • अब तक सबसे महत्वपूर्ण अनदेखा बिंदु : द्रौण आचार्य की महानता देखिये, वो चाहते तो कह देते कि ठीक है कल  से  आश्रम में  आ जाना, और उससे थोड़ी बहुत उछल-कूद करवाकर  भगा देते, आजकल जैसा तार्किक  छात्र तो एकलव्य था नहीं जो कहता पूरा सिलैबस कराओ, या तुम्हारी शिकायत कर दूंगा, उसके लिए तो गुरु की आज्ञा सब कुछ थी | जैसा की बाद में एकलव्य ने द्रौण की मूर्ती बना कर उसके समक्ष ही धनुर-विद्या सीखी थी | द्रौण जानते थे कि वे अगर सिखाते तो पूरा सिखाते, अपना सम्पूर्ण उसमे लगा देते, फिर चाहे वो अर्जुन से श्रेष्ठ बनता या इंद्र से, परन्तु द्रौण भेदभाव नहीं करते, कपट नहीं करते, इसी विश्वास के बल पर ही तो तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ जाकर एकलव्य ने द्रौण से सीखने का सपना देखा जबकि द्रौण सिर्फ राजपुरुषों को ही शस्त्र विद्या सिखाते थे  (क्यों) | इसलिए उन्होंने सिखाने के लिए ही मना  कर देने का निर्णय लिया |  ( क्यों ?)

  • क्योंकि अगर एकलव्य धनुर्विद्या (जो कि उस समय का सबसे घातक/मारक/प्रभावी हथियार था ) सीख गया तो वह कल को शासन के लिए खतरा बन सकता है,        (कैसे ?)

  • चूंकी उसने सबसे जरुरी वह  तप-अध्ययन नहीं किया था जो बाकी प्रशासन चलाने वाले लोग बचपन से ही करते हैं | जिससे उन्हें हथियार के इस्तेमाल करने का विवेक आता है | हथियार चलाने में निपुण होना एक बात है और मानवीय गुण विकास की शिक्षा के साथ आना दूसरी बात है | अच्छा निशानेबाज कोई आतंकी भी हो तो क्या उसका ओलम्पिक में सम्मान किया  जाएगा ?

  • दूसरी बात एकलव्य का दुरूपयोग ज्यादा होने की सम्भावना थी, शकुनी जैसे कूटनीतिज्ञ जिस देश में हो, शिशुपाल हो, जरासंध हो जहाँ ..तो कोई भी पैसे देकर उसे अपनी सेना में मिला लेगा | या कल को एकलव्य ही अपनी सेना गठित करके शासन पर आक्रमण कर दे तो ? आप सोचिये द्रौण शासन के रक्षक भी है | अतः उन्होंने वही किया जो समय की मांग थी | अभी बात आधी ही हुयी है …..

  • अब मान लीजिये कुरुक्षेत्र में धर्म-अधर्म की लडाई में एकलव्य (वेल ट्रेंड योद्धा) दुर्योधन के साथ होता तो ? चूंकी द्रौण स्वयं एक राजकीय-अधिकारी के नाते अपने राज्य के साथ खड़े थे यानी दुर्योधन के साथ, अधर्म के साथ, ऐसे में अगर द्रौण अंगूठा नहीं मांगते और एकलव्य कौरव सेना में शामिल होकर युद्ध का परिणाम, भारत का इतिहास ही बदल देता ! कम से कम द्रौण की जिम्मेदारी तो थी ही ये होने से रोकने की |

    और महत्वपूर्ण बात जिस प्रकार केजरीवाल बढ़िया आन्दोलन चला सकता है परन्तु सरकार नहीं, कुमार विश्वास बढ़िया प्रेम-कवितायें रच सकता है परन्तु शासन नहीं फिर भी जनता ने इनको सत्ता पकड़ा दी तो अब भ्रष्टाचार बढ़ गया, बलात्कार नेता ही करने लगे | जैसे मार्कंडेय काटजू बढ़िया जजगिरी कर सकते है क्योंकि संविधान और IPCपढ़ा है, परन्तु किसी गुरु के आश्रम में बैठकर संस्कृत-दर्शन-अध्यात्मविद्या नहीं सीखी फिर भी देश की कई महत्वपूर्ण समस्या सुलझाने के बजाkn2.pngय महाभारत के पात्रों को  जांच रहे है IPC के हिसाब से …तो क्या होगा  ? फिल्मो के अच्छे-अच्छे नचैया कलाकार जब देशभक्ति, धर्म, समाजसुधार पर अपने दिमाग से भाषण देने लगे तो वही होता है जो आजकल हो रहा है … मतलब कोई सुधार न होकर स्थिति का और बिगड़ना | और ऐसा ये सब या तो अपने पैसों के दम करते है या अपनी पहुँच के | तो भाइयों महाभारत को समझना है तो महाभारत को पढ़िए भारत की न्याय-व्यवस्था समझनी है तो काटजू  जैसे लोगों से मिलिए | धन्यवाद | अपनी राय अवश्य प्रस्तुत करे | @ahmabhi

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