infinite या अनन्त होता क्या है ? क्यों मनुष्य इस शब्द को पढ़कर भी इसका अर्थ ग्रहण नहीं कर सकता है ? ईश्वर यदि अनंत है तो फिर ईश्वर का सही स्वरुप क्या है ? किसका भगवान सही है ?

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“हरी अनन्त हरी कथा अनन्ता”

हरी अनन्त अर्थात क्या समझे ?? हरी कथा अनंता अर्थात क्या ?

असल में आप समझे ही नहीं ! क्योंकि कोई भी नहीं समझ सकता |

कृपया बताइए निम्नलिखित वाक्य का अर्थ क्या है |

“मेरा घर मुम्बई से एक किलोमीटर दूर है”

आप इस वाक्य का अर्थ समझ गए क्योंकि आपको

मेरा (ok समझ गए )

घर (ok समझ गए)

मुम्बई (ok समझ गए)

से (ok समझ गए)

एक (ok समझ गए)

किलोमीटर (ok समझ गए)

दूर  (ok समझ गए)

है (ok समझ गए)

इन सारे शब्दों के अर्थ आप जानते थे | इन शब्दों को पढ़ते ही इनके चित्र आपके मन में बन जाते हैं | जब आप इन्हें सोचते है इन सी जुडी आकृति मष्तिष्क में उभर आती है | उदहारण के लिए “मेरा” या “घर” या “मुम्बई” का कोई न कोई चित्र आपके दिमाग में पहले से फिक्स है, बना हुआ है | जब भी आप “घर” शब्द सुनते है, एक चित्र आपके दिमाग में उभरेगा और आपका दिमाग उसे पहचान जाएगा, फिर दिमाग के दूसरे भाग में सन्देश जाएगा कि मैं “यह” समझ गया, जानता हूँ | यह सारा काम एक सैकेंड के भी करोड़वे हिस्से में पूरा हो जाएगा | कुल मिलाकर बात यह हुई कि हमें कोई भी बात सुनकर, पढ़कर, देखकर, जानकार, सोचकर, यहाँ तक कि कल्पना करके भी तभी समझ में आती है, जब हम उस चीज/बात से पहले से से परिचित हों, यानि उसका एक ख़ास पहचान रुपी चित्र हमारे दिमाग में पहले से मौजूद होता है | लेकिन जिन वस्तुओं को आप नहीं जानते उनको आप कैसे समझते हैं ? जैसे मान लीजिये कि आप कभी “सचिन तेंदुलकर की किचिन” में नहीं गए, लेकिन ये शब्द सुनते ही आपके मन में दो चित्र बन गए होंगे, एक सचिन का दूसरा किचिन का (किसी भी किचिन का जिसका चित्र या दृश्य आपने पहले देखा होगा) | यहाँ हमने सचिन की किचिन नहीं देखी परन्तु उसकी कल्पना फिर भी की जा सकती है क्योंकि किचिन और मनुष्य का चित्र हमारे मष्तिष्क में पहले से उपस्थित रहता है |        अब किसी भी विद्यार्थी ने इलेक्ट्रोन नहीं देखा | परन्तु इलेक्ट्रोन शब्द सुनते ही इसका एक चित्र दिमाग में तुरंत उभर आता है, क्योंकि हमने पहले कहीं न कहीं वैसा चित्र किताब में देखा होगा | जबकि हकीकत यह है कि इलेक्ट्रोन को चित्र के माध्यम से समझा ही नहीं जा सकता क्योंकि वह अत्यंत सूक्षम होता है | और तो और इन दो शब्दों “चित्र और इलेक्ट्रोन” का आपस में कहीं से कोई मेल ही नहीं बनता | फिर भी हम काम चला रहे हैं | फिर ब्रह्माण्ड का चित्र भी आपने किताब, टीवी, इन्टरनेट, या फिल्मों में कही  न कही देखा  होगा, वैसे रोज रात को हम आसमान तो देखते ही आ रहे हैं बचपन से | ब्रह्माण्ड शब्द सुनते ही हमारे दिमाग में क्या चित्र अथवा आकृति उभरेगी ? वही सब न जो हमें पहले से मालूम है जैसे आसमान में देखे हुए नज़ारे, किताबी या डिजिटल चित्र आदि | परन्तु क्या सममुच हम रात को आसमान में या किताब में या टीवी-कम्प्यूटर में ब्रह्माण्ड का असली चित्र ही देखते है ? नहीं न ? क्योंकि आज तक किसी को पता ही नहीं है कि पूरे ब्रह्माण्ड में हम किस कोने में हैं, या हमारी आकाश गंगा किस कोने में है , हम तो ब्रह्माण्ड का एक बेहद छोटा अंश या एक कोना ही देखते हैं, फिर भी हमारा दिमाग जानता है कि ब्रह्माण्ड शब्द सुनते ही क्या चित्र बनाना है | मतलब अगर आप सोचें तो सोचते-सोचते पागल हो जाएँगे कि हम कितनी अधूरी और बकवास संकल्पनाएँ दिमाग में बनाते है | लेकिन फिर भी हमारा कम चल रहा है | ये सब उदहारण अभी तक जो भी हमने देखे बेहद सीमित अवधारणा वाले थे |

अब हम आते हैं शब्द “अनंत” पर |  … अनन्त, infinite | जिसका अंत नहीं हो

| ….. अनन्त सुनते ही क्या चित्र आपके दिमाग में उभर रहा है ?

 याद रखना भैया यह अनन्त है | इसका पार नहीं पाया जा सकता |      ………..अनन्त ……….

क्या हमारा दिमाग अपने मन में अनन्त का चित्र बना  सकता है ? या सिर्फ उसके किसी एक छोटे भाग का ही चित्र बना सकता है | क्या सिर्फ पैडल को देखकर कोई नया इंसान पूरी साईकल का चित्र समझ सकता है ? क्या सिर्फ एक कील को देखकर पूरा जहाज समझा जा सकता है | फिर अनन्त सुनते ही आप क्या समझते है पैडल या साईकल ? कील या जहाज  ? मतलब समझ जाते है कि अनन्त क्या है ? या दिमाग काम ही नहीं करता | जैसे छोटे केलकुलेटर में 8 अंको से अधिक अंको की संख्या का गुणन करने पर वह error बता कर अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है | क्या ऐसा error ही तो नहीं आ रहा दिमाग में अनन्त शब्द सुनकर, और बार-बार बचपन से यही error ही देखते रहने के कारण अब दिमाग इसे ही असली उत्तर समझ कर  error चित्र को ही “अनन्त” के चित्र के रूप में कल्पित करता हो ?

चलिए शुरू से शुरू करें | आपने सबसे पहले अपनी ज़िन्दगी में अनन्त शब्द कब सुना था ? बचपन में स्कूल में ? गणित की कक्षा में ? गणित की पुस्तक में ? जब “अनन्त संख्याओं” का जिक्र आया था | एक बात सुनकर भले ही शायद आपको अच्छा न लगे परन्तु जान लीजिये कि “अनन्त-संख्या” जैसी कोई वस्तु होती ही नहीं है | प्रेक्टिकली संभव ही नहीं है | चाहे जितना दिमाग लगाइए आपके दिमाग में जो आरहा है वह error ही है | क्योंकि आप छोटे केलकुलेटर से 8 अंको से ज्यादा का गुणा कर रहे हैं |

आईये और विस्तार से समझते हैं | मान लीजिये आपने संख्या गिनना प्रारंभ की तो आप कहाँ से शुरू करेंगे ? 1 से या -infinite से ? चलिए 1 से ही शुरू कीजिये तो संख्या कहाँ तक जाएगी ? आप कहेंगे अनंत तक जायेगी | ठीक है | अब थोडा सा मजाकिया लहजे में कुछ बात कहते हैं …  आपने जो संख्या गिनना शुरू की है वह किस भाषा शुरू की है तथा उसकी फॉण्ट साईज क्या है ?images.png 

क्या आपने एक निश्चित भाषा के अंको को एक निश्चित फॉण्ट साईज में, एक सीधी और आगे बढ़ती हुई रेखा में ही सोचा है ? अथवा  चारों कोर्डिनेट की दिशाओं में सोचा है ?

  अगर एक रेखीय सोचा है तो आप उसे अनन्त किस आधार पर कह रहे हैं ? क्योंकि जीरो पर वे समाप्त हो रही है | और अगर चारों दिशाओं में सोचा है तो बाकी की दिशाओं में क्यों नहीं सोचा ? क्योंकि संख्याएँ तो प्रत्येक क्वाड्रेंट के बीच में भी

हैं |

images (1).jpgबीच के बीच में भी है | अगर आप कहे कि आपने पूर्णांक या धनात्मक संख्याए ही सोची हैं तो फिर से वही बात आ जाएगी कि फिर वे संख्यां अनंत कैसे हो जायेंगी क्योंकि जहाँ ऋणात्मक या दूसरी संख्याएँ होंगी वहां आपकी संख्यां नहीं होंगी और जहाँ आपकी संख्याएं नहीं होगी वहां आपकी संख्याओं की सीमा मानी जायेगी |और जिसकी सीमा हो गई वह सीमित हो गया …फिर वह अनंत कैसे रहा  ? यानी आपको यदि अनंत संख्याएं ही सोचनी है तो आपको सब सोचना पढ़ेगा | एक भी चीज छूटी कि  आपकी संख्याओं की सीमा बंधी | सीमा बंधी और अनंतता समाप्त | अब आपको सब सोचने के साथ सारी  भाषाओँ और सारे फॉण्ट साईज में भी सोचना चाहिए, ब्रह्माण्ड की सभी भाषाओं और फॉण्ट साईज में कल्पना करनी पढेगी तभी अनंत संख्याओं की कल्पना सही होगी | आपको सिर्फ पृथ्वी गृह की भाषाओं की जानकारी होगी परन्तु दूसरे गृह आदि को भी इसमें ध्यान रखना है तभी अनंत अनंत बनेगा नहीं तो उसका अंत हो जाएगा |

अब याद कीजिये बचपन से आप “अनंत-संख्या” शब्द पढ़कर मन में जो चित्र बना रहे थे, वह कितना अधूरा था | तो इसका मतलब यह हुआ कि हम अनंत संख्याओ की कल्पना भी नहीं कर सकते |

चलिए ये तो अभी कुछ भी नहीं था, हम अनंत संख्याओं के उस सिद्धांत पर आते हैं जिससे आपको अधिक परेशानी अथवा अधिक रोमांच होगा | आप कौन है ? आप वह व्यक्ति हैं जो अनंत संखाएं सोच रहा है | अच्छा ! कैसे सोच रहा है ? सिर्फ सोच रहा है अथवा अनंत संख्याएं होती भी है ? अगर संख्याएं अनंत होती है तो आदमी कहाँ से आ गया ब्रह्माण्ड में ?  क्योंकि यदि कोई भी चीज अनंत है तो इसका मतलब सर्वत्र सिर्फ वही है, अगर एक चींटी जितनी भी जगह उस अनंत वस्तु के आलावा ब्रह्माण्ड में मानी जायेगी तो इसका मतलब यह हुआ कि जहां चींटी है वहां वह अनंत वस्तु नहीं है | अगर कहीं अनंत वस्तु नहीं है तो उस जगह के ठीक पहले वह समाप्त हुई होगी | तब फिर हम उसे अनंत वस्तु कैसे मानेंगे ?

और आगे आते है | अनंत शब्द के साथ वस्तु शब्द कहां से आ गया अगर वह वस्तु अनंत है तो ? क्योंकि जो अनंत है वह वस्तु कैसे हो गई ? मतलब जो चीज वस्तु नहीं है उस चीज में अनंत वाली वस्तु की गणना क्यों नहीं की जा रही है ? क्या वह अनंत नहीं है ?

आप किसी भी शब्द के आगे अनंत कैसे लगा सकते हैं ? यह तो मूर्खता है | अनंत सिर्फ अनंत हो सकता है |आप अनंत के आगे कोई विशेषण लगायेंगे तो वह अनंत फिर विशेषण के द्वारा सीमित हो जाएगा | अतः अनंत के आगे भी और पीछे सिर्फ एक ही शब्द लग सकता है वह है अनंत | (अगर किसी को अनंत की यह चर्चा समझ में नहीं आ रही है तो यहीं से अनंत के पैर छूकर निकल सकता है)

अब हम दूसरी संकल्पना पर आते है | “अनादि”  .. अब यह अनादि  क्या है ? जिसका आरम्भ न हुआ हो, न हो सकता हो | तो अगर हम थोडा दिमाग पर जोर देकर समझें तो ऐसा सिर्फ अनंत ही हो सकता है जिसका आरम्भ न हुआ हो, क्योंकि अगर उसका आरम्भ हुआ होता तो वह उसकी शुरुआत यानी एक छोर माना जाता और जिसका एक छोर हमें मालूम है हम उसे अनंत नहीं कह सकते है |

अतः अगर अनंत है तो सिर्फ वही अनादि भी होगा | अनादि और अनंत विलोम शब्द नहीं है, ऐसा कोई मूर्ख ही निर्धारित कर सकता है कि अनादि का विलोम अनंत है | अनादि और अनंत सिर्फ पर्यायवाची है, और यह दोनों “एक” ही हो सकते है | यानि जो अनादि है वही अनंत है |

चलिए अब आते हैं तीसरी संकल्पना पर अनंत कितने हो सकते है ?

गणितीय रूप से कहिये या व्यवहारिक रूप से अनंत सिर्फ एक ही हो सकता है | दो अनंत हो ही नहीं सकते | जहां दूसरा अनंत आया कि पहला अनंत सीमित हुआ | अतः सिर्फ एक ही अनंत हो सकता है जिसे सिर्फ “अनंत” कह सकते है |

इसलिए अन्नत संख्याएं अनंत दिशा, अनंत लम्बाई, अनंत ऊँचाई, अनंत दूरी, अनंत स्थान ये सब गलत संकल्पनाएँ है | जो अनंत है वही लम्बा, ऊँचा, दूर, स्थान, हवा, पानी, ठोस, द्रव, वायु, सब वही हो सकता है | क्योंकि वह अनंत है | और जो अनंत है वह अनादि भी है |

चलिए  अब हम चौथी और सबसे महत्वपूर्ण संकल्पना पर आते हैं यानि “अनन्त दर्शन” | सिर्फ अपने समझने के लिए हम मान लेते हैं कि एक  रेल की पटरी है जिसकी लम्बाई अनंत है, अब  आप  इस  पटरी  को  किसी  एक  स्थान  से, किसी  एक निश्चित  कोण  से   देख रहे  हैं  | तब  क्या  आप  यह  दावा  करेंगे  कि  आपने  रेल  की  पूरी  पटरी  देख  ली  है  ? आप  तो  अभी  इसके  एक  ओर  ही  है निश्चित  ही  दूसरी ओर  से  इसी पटरी को  देखने से पहले ले नज़ारे में और अब  के  नजारे  में  थोडा  अंतर  आएगा ही |
 फिर  10 किलोमीटर, 100 किलोमीटर के पश्चात् उसी  पटरी  को  देखने पर और अंतर आएगा, हर समय और हर जगह और हर कोण से वह रेलवेपटरी सतत एकसी  दिखाई  देगी  क्या  ? नहीं न ? तब कोई अगर कहता है कि उसने देखा कि पटरी का रंग भूरा  है और उनके पास हरी घांस लगी थी, और दूसरा  कहता है कि पटरी का रंग कत्थई था और उसके पार घांस नहीं बबूल के पेड़ ही थे, आप किसे  सही मानेंगे ? दो आदमियों ने एक ही पटरी को दो अलग-अलग स्थान से देखा इसलिए दोनों सही है और पटरी के दोनों वर्णन सही है | मान लीजिये कि सूरज पश्चिम में डूब रहा है और मुम्बई के बीच पर लोग उसे देख रहे हैं | उसी समय यूरोप में किसी स्थान पर लोग उसी सूरज को प्रातः उगता हुआ देख रहे हैं तो आप किसे सही मानेंगे ? दोनों ने एक ही सूरज को अलग-अलग स्वरुप में कैसे देखा ? एक ने उगते हुए एक ने डूबते हुए ? यह सूर्य की विशालता के कारण ऐसा हुआ | परन्तु जो इतना विशाल है कि अनन्त है उसे लोग कैसे देखेंगे ? जितनी आँखे उतने वर्णन  नहीं होंगे क्या ? फिर किसी को गलत कैसे कहा जा सकता है ? सभी अपने-अपने दृष्टिकोण से सही है और कोई ऐसा भी नहीं कह सकता कि कौन ज्यादा सही है | अनंत के समक्ष सभी का दर्शन बराबर है | आप जिस समय “अनत-स्थान” को अपने सामने देखेंगे ठीक उसी समय वह अनंत स्थान आपके पीछे, ऊपर, और नीचे भी होगा यहाँ तक कि आपका स्वतंत्र अस्तित्व होने की बजाय आप स्वयं उस अनंत स्थान का अंश ही होंगे, नहीं तो आपके सामने कोई अनंत नहीं होगा |

    अब हम  हिन्दू दर्शन पर आते हैं जो भगवान के सन्दर्भ में कहता हैं कि  वे अनंत है | उनके स्वरूप, गुण आदि भी अनंत है | स्वाभाविक है कि अगर इश्वर अनंत है तो उसकी हर चीज अनंत होगी | यदि इश्वर अनंत नहीं है तो निश्चित ही कोई इश्वर से भी बड़ा होगा, क्योंकि अगर इश्वर अनंत नहीं है तो निश्चित ही उसकी एक सीमा होगी, तब फिर कुछ ऐसा भी होगा जो उसकी सीमा के भी बाहर होगा | और जो इश्वर की सीमा के भी बाहर होगा वह निश्चित ही इश्वर से बड़ा होगा, बड़ा इसलिए कि वह ईश्वर के परे है | तब फिर हमें ईश्वर को छोड़ उस परे वाले को ही पूजना चाहिए था | लेकिन ऐसा कुछ है नहीं | हमने हो सर्वत्र है, सर्वव्यापी है उसे ही ईश्वर माना है, हमने इश्वर को अनन्त गुणराशी, अनंत शक्ति, अनंत  परिमाणी माना है | इसलिए ईश्वर का  कोई “एक ही” स्वरुप नहीं हो सकता है | उदहारण के लिए कोई कहे कि मेरे ग्रन्थ में लिखा ईश्वर का स्वरुप ही सच्चा है और ईश्वर के दो पंख भी होते हैं तो इसका मतलब हुआ कि उसे अभी ईश्वर और उसके अनंत स्वरुप का ज्ञान नहीं हुआ है | अगर सिर्फ पंख वाला ही  ईश्वर हो तो फिर मैं तो उसे ईश्वर बुलाने की बजाय कार्टून बुलाना अधिक पसंद करूँगा | क्योंकि जिसका स्वरुप तक एक हो वह ईश्वर कैसे हो सकता है ? कम से कम आम आदमी भी जन्म से मृत्यु के बीच चार-पाँच बार अपना स्वरुप बदल लेता है | खैर … बात सिर्फ यही है कि जिसने ईश्वर की जिस रूप में कल्पना की है अथवा दर्शन किया है वह सही है | क्योंकि अनन्त है | उसका न आदि है न मध्य है न अंत है | इसलिए ब्रह्माण्ड का प्रत्येक स्वरूप ईश्वर का ही स्वरूप है | आप जिस स्वरुप को ईश्वर नहीं मानोंगे वह स्वरुप ही ईश्वर से अधिक शक्तिशाली माना जाएगा | अब ईश्वर के वर्णन से जुडी बातों पर आते हैं वेदों में ईश्वर को नेति-नेति के द्वारा समझाया गया है कि यह भी नहीं और यह भी नहीं ..यानी प्रत्येक वस्तु ही वस्तुतः ईश्वर है | हिन्दुओं के अनुसार “ईशावास्यमिदं सर्वं” है यानी सब कुछ ईश्वरमय है | “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, अहम् ब्रह्मास्मि, तत त्वं असि, प्रज्ञानं ब्रह्म, अयात्मा ब्रह्म, आदि-आदि ऐसे विभिन्न तर्कों के माध्यम से एक ही ईश्वर के सर्वत्र व सर्वस्वरुप में होने की बात कही है जो कि हर विधि से सही है | प्रत्येक वस्तु ईश्वर है, प्रत्येक जीव ईश्वर है, एक अनंत ईश्वर ने ही सर्वत्र अपनी सत्ता फैला रखी है  उसी के भीतर कहीं हम है जो उसके किसी अंश को ब्रह्माण्ड समझ रहे हैं | इसलिए हिन्दू धर्म में प्रत्येक मनुष्य को बराबर, दैवीय, माना ही गया है, इसीलिए अहिंसा, सत्य आदि गुणों के पालन को कहा है कि दूसरा कोई है ही नहीं सिर्फ ब्रह्म ही है | एकोहम बहुस्याम … एक ब्रह्म ने अनेक रूप में खुद का ही विस्तार किया है  | इसीलिए आत्मा की अमरता का सिद्धांत है | आत्मा यदि अमर है तो अनंत है और अनंत दो हो नहीं सकते इसलिए ईश्वर ही आत्मा है, वही परमात्मा है | इसलिए हमारे यहाँ ईश्वर को किसी भी स्वरुप में पूजा करने को कहा गया है चाहे देवी स्वरुप, चाहे पुरुष स्वरुप, चाहे बालक स्वरुप, चाहे पति बनाकर, चाहे मित्र बनाकर, चाहे स्वामी बनाकर, चाहे निर्गुण निराकार बनाकर चाहे जैसे पूजिए | सभी लोग एक अनंत ईश्वर को ही पूज रहे होते हैं | जैसे सभी सदियाँ अलग-अलग दिशाओं से निकलकर, अलग-अलग मार्गों से चलकर एक ही समुद्र में मिलकर समुद्र स्वरूप हो जाती है वैसे ही ईश्वर को पाने के सभी अलग मार्ग एक ही ईश्वर तक ले जाते हैं, यह हिन्दुओं की मान्यता है इसलिए हिन्दुओं ने धर्म के नाम पर कभी किसी दूसरे देश में जाकर अत्याचार नहीं किया |

 परन्तु हिन्दुओं के विपरीत यदि कोई ऐसा दावा करे कि नहीं नहीं .. ईश्वर के  बारे में सच्चा ज्ञान तो सिर्फ उनकी धर्म की किताब में लिखा है, बाकी सारी धर्मों की किताबे पढना पाप है | तब आप क्या कहेंगे ? खुद सोचिये क्या इश्वर जैसी “अनंत” सत्ता का  ज्ञान एक पुस्तक में समा सकता है ? और ऐसी पुस्तक जिसमे ईश्वर के एक ही नाम, एक ही स्वरुप, उसके एक ही दिशा में होने का दावा किया गया हो ? मुझे  तो यह कोमेडी जैसी लगती है |  किसी का भगवान सिर्फ “ऊपर” ही  है तो किसी का सिर्फ बाएं दिशा में ..क्या है यह ?

जबकि  पृथ्वी के बाहर ऊपर या नीचे, दांये या बांये जैसी कोई संकल्पना ही नहीं होती है | ऊपर और नीचे ये दोनों शब्द सिर्फ पृथ्वी के सापेक्ष ही अर्थ रखते हैं, अनंत ब्रह्माण्ड में आप किसे ऊपर कहेंगे और किसे नीचे ? निर्धारित कैसे करेंगे ?  अब यदि कोई कहे कि सिर्फ उनका धर्म ही सच्चा है और बाकी  सारे पृथ्वी के मनुष्य उनका धर्म अपना ले … तो समझ जाइए कि उनसे बड़ा मूर्ख अब इस पृथ्वी पर कोई नहीं है | इन्ही लोगों ने ईश्वर के नाम पर सर्वाधिक रक्तपात मचाया है पृथ्वी पर और आज भी मचा रहे हैं | आज भी चालाकी और धूर्तता से दूसरे धर्मों के लोगों को सताने में ये लोग आनंद महसूस करते है | असल में इन्हें एक ही “किताब” पढने की अनुमति सिर्फ इसलिए है कि बाकी की किताबें इनकी पोल खोल देंगी |  

 

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